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28 января 2022
Dao De Ching Hindi

Ashish Dhabale https://www.upwork.com/freelancers/~01bd1a820309c9afc9

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Ashish Dhabale https://www.upwork.com/freelancers/~01bd1a820309c9afc9
दाओ दे चिंग


दाओ के अनुसार अस्तित्व की परिभाषा शब्दों में संभव नहीं
वह तो केवल विफलता की ओर व्यर्थ प्रयास मात्र होगा

स्वर्ग और पृथ्वी के रहस्य का कोई नाम नहीं
वह शब्दों में बंध जाता है जिसे नाम दिया जाए
परंतु पदार्थ का कोई भी सार और उसका कोई भी नाम,
दोनों ही उत्पत्ति है एक ही सत्य की

हमें संतुलित होने से रोकती है हमारी वासनाएं ही केवल
केवल वह ही सार समझ पाता है जो हो इच्छा से रहित
शब्दों के जंजाल से होकर उस एक परम तत्व की ओर जाता है जो मार्ग
छुपा है यही, माया के इन असंख्य रूपों के बिच कही

केवल परिभाषाएं है अच्छाई और बुराई
हम उसे कुछ आयाम देते है किसी को नाम दे कर
सुंदरता का अस्तित्व आधारित है कुरूपता से उसकी तुलना पर
हम मृत्यु कहते है जीवन के अभाव को ही
किसी को लंबा और किसी को छोटा कहते है हम एक दूसरे के संबंध मे
ऊँचा उठ पाना संभव है गहराई में गिरने पर ही
एक तार की ध्वनि उठाने के लिए आवश्यक्ता है एक दूसरे ध्वनि की
एक दूसरे के पश्चात ही आते है भविष्य, वर्तमान और भूतकाल आदि
इसलिए ज्ञानी अकर्म करता है, वह कर्ता नही बनता
उसकी शिक्षा मौन होती है और उसके स्वाध्याय मे शब्द नही
वह करता है निर्माण किंतु स्वामित्व नहीं लेता
बार बार गति उत्पन्न करता है बिना किसी की मदद के
परिवर्तन करता है प्रयास किये बिना
परिपूर्ण एवं सफलता में वह अभियान से मुक्त है रहता
ऐसा करके वह स्वयं के लिये आदर एवं प्रेम नहीं खोता

यदि ज्ञान को सम्मान न मिले
तो अच्छाई का पक्ष कौन ले

यदि आभूषण आकर्षीत ना करे
तो ऐसी मूल्यवान चिजे किसको चोर बनाएंगी

यदि कोई इच्छा ही शेष न रहे
तो कौन हमे अस्वस्थ करे

तो फिर व्यवस्था की बागडोर अपने हात लेने में क्या सयानापन है
वह व्यवस्था जो केवल अन्न और वस्त्र देने का प्रयास मात्र करती है
वह व्यवस्था जो ज्ञान और आकांक्षा दोनो को समाप्त करने की चेष्टा करती है

उसका काम है इच्छाशक्ती का र्‍हास करना और भावनाओं को ठंडा करना

यह सत्य जो जानते है, उन्हे दूसरों को उत्तेजित करने की आवश्यकता नही
क्योंकी अकर्म शांती प्रदान करता है

सहज नहीं दाओ की परिभाषा
जो सभी भौतिक वस्तूओं का स्रोत है वह अभौतिक है
वह स्वयं रिक्त है किंतु अभिव्यक्तियों में असीम
स्वयं निराकार किंतु है सभी का आधार
अथाह होकर सभी घटनाओं का कारण वह है

उसकी तुलना करने के लिए कोई भौतिक वस्तू उपयुक्त नहीं
जो कुछ भी अस्तित्व में है वह उसके समक्ष है केवल धूलीकण
अवर्णनिय है दाओ की लालीमा, विवेक और ओज
तुलना तो केवल स्वयं के अनियंत्रीत अस्तित्व से हो पायेगी
वह तो अग्रदूत है आरंभ के आरंभ का
नहीं जानता मै कि कौन है इसका निर्माता

भोगों के प्रति उदासीन हैं पृथ्वी, आकाश
ठिक वैसे ही प्रकृति है मानवता के प्रति
यहां दुर्भागी के लिए सहानुभूति का कोई प्रयास नही
न यत्न है शाश्वत एवं स्थिर क्रम मे परिवर्तन का
प्रकृति के नियमों का पालन करे सो बुद्धिमान मनुष्य
तो क्या वह लाभ देखे मानवता में जन-जन के लिए
प्राकृतिक जीवन ही सराहनीय है

कुछ ऐसा हैं जिसके उपयोग का आधार है रिक्तता
जैसे कोइ बांसुरी या धौंकनी
जितनी उच्च हो रिक्तता, उतनी ही अधिक संभावना है ध्वनि की

जितनी अधिक आवेग, उतना अधिक लाभ
अनंत अवकाश जैसे पृथ्वी से स्वर्ग तक
जैसे बांसुरी या धौंकनी कोई, हो पूर्ण रिक्त

ना हो दिर्घ चर्चा के योग्य यद्यपि
वह सभी के लिये अनुसरण के योग्य है

यदि स्वर्ग-पृथ्वी के ब्रह्मांड के उत्पत्ति की खोज की जाए
तो ऐसा एक द्वार खूल जाता है जो आधार है अस्तित्व का
जन्म के स्त्रोत का उद्गम है उस द्वार में
उस द्वार के पश्चात "शुण्य" है
वह द्वार है "संभावना" से "सत्य" की एक शाश्वत कालातीत रचना
"शुण्य" से अभिप्रेत है की विविधता की कोई सीमा नहीं ना है कोई अंत

एक साधन जो अविरत खींचते धागे के समान है

ऐसा है : क्योंकि उन्हे अपनी चिंता नही
पृथ्वी और आकाश के समय को भी कहा चिंता है
इसी कारण एक बुद्धिमान व्यक्ति
कई वर्ष उनके लिये व्यतित करता है जो उसका मुल्य नही जानते
सबके बाद जाना चाहते है वह सबके आगे होगा
वह आनंद पायेगा जो उसके खो जाने से नही डरता
जिसे अपनी चिंता न हो, भाग्य उसका संग कभी नहीं त्यागता

सर्वोच्च गरिमा का उदाहरण है जल
सबका भला कर कामना है तो बस मौन की
पद-प्रतिष्ठा के लिए किसी से कोई संघर्ष नही
और इतना की नम्र भी कोई भी न चाहे
देखो तो पानी मे: तुम्हे अपना चेहरा दिख जाएगा
दाओ की धारा समान ही इसका प्रवाह है

और ज्ञानी इसलिए अपने मन की इच्छा के अनुसार
सबके साथ मिलता है और उस मे सभी पाते है विनम्र आश्रय
वह सब को शांतिपूर्वक दिशा देता है सत्य भाषण से
निर्णय लेता है समय पर, कार्य करता है क्षमता से
घुल-मिल जाता है और हमेशा मौन धारण करता है पानी की तरह
उसके वृ्त्ती का मौन उसे समस्त अपराध एवं संकटो से बचाता है

कब रुकना है यह पता होना चाहिये
किनारे के पार आप पात्र नहीं भर सकते
अतिरिक्त धन की रक्षा संभव नही
तलवार की धार यदि अति तेज हो तो कुंद हो जाएगी
और भौतिकता के गर्व की कोई सीमा नहीं
ऐसा व्यवहार दुर्भाग्य को आमंत्रीत करेगा

आपके अनुरुप काम पूरा होते ही दुर हो जाना
यही प्रकृती के नियम के अनुरुप है

१०

यदि आप अपने आप से सहमत हो
अपने पूरे शरीर के साथ और अपनी पूरी आत्मा के साथ
संपूर्ण शरीर एवं आत्मा के साथ यदि आप प्रयत्नरत है
तो आप अपनी पूर्णता खोए बिना कार्य कर पाएंगे
यदि प्रसंसा के समय आप आत्म नियंत्रित हो
तो आप नवजात बालक के समान हो जाओगे
यदि आपका चिंतन शुद्ध्‍ा हो
तो आप मूर्खता से बच जाएंगे
लोगों से प्यार करने के लिए यदि आपको कारण नही चाहिये
तो अपने ही देश में आप देश से श्रेष्ठ हैं
धूर्तता किए बिना आप स्थिति को नियंत्रीत कर पाएंगे
यदि आप मातृप्रेम के समान शाश्वत हैं
किसी को जीवन देते और किसी को मृत्यु
आप पराजित न हो शांति का अनुभव करेंगे
यदि आप समस्त जगत को समानता से देखते है

पालन करो और शिक्षा दो, देखभाल करो, जन्म दो
और बस अधिकार जताएं बिना निर्माण करो
कर्म करो, किंतु फल की अपेक्षा न करो
सम्मान पर्वा किए बिना बेहतर व्यवस्था करो
यदि ऐसा हो तो तुम दे की महिमा जान पावोगे

११

ऐसा पहिया क्या उपयोगी होगा जिसके धुरी में कोई छेद न हो
घड़ा तो होता है मिट्टी का मगर काम आता है उसका खालीपन
जितनी अधिक जगह अंदर हो घर उतना ही अधिक सुखद होता है

इस प्रकार रिक्तता-शून्यता उपयोगी है
ताकी कुछ भर कर अर्थार्जन हो सके

१२

अति रंग आंखों की हानी करते है
अति ध्वनी बहरा बनाती है
स्वादों का अतिरेक संवेदनाहिन बनाता हैं
मनोरंजन की मार से दिल को खुश करना अर्थहिन है
इच्छाओ का अतिरेक शांतिमय जीवन में बाधा बनता है
धन की लालसा अधिकांश लोगों के अपराध का कारण हैं

ऐसे दिखावें से ज्ञानी प्रभावित नहीं होंते
वह तो केवल मूलभूत आवश्यकता के विषय मे सोचते है

१३

प्रशंसा हो या धिक्कार, हमे समानता से करते है चिंतीत और व्यस्त
स्वयं को आप जितना अधिक महत्व देते हैं, उतना ही मजबूत होता है भय
अवमूल्यंन से आप को भय हैं कि आपका अच्छा नाम डुब गया
उत्पीड़ीत लोगो में पहले से ही है विवशता का गहराता भय

जब भी आप केवल स्वयं को अतिरिक्त महत्व नहीं देते
आपको दूसरों की मत प्रभावित नहीं करता

आप विचारों में स्वयं को यदि इस जगत से ऊपर समझ बैठे
तो आप इस पर निर्भर और लाचार रहेंगे
किंतु यदि आत्मसंतुष्टी के बजाय आपका सारा जीवन दूसरों को समर्पित हो
तो आपको सारा जग मिल जाएगा
आपको सभी का उचित प्रेम एवं विश्वास प्राप्त होगा

क्योंकि, दुनिया उन पर विश्वास के साथ उन पर समर्पित हो जाती है
जो स्वयं को ना इसके विपरीत मानते है, ना विभक्त

१४

दाओ के अनुसार इंद्रियों की सीमाएँ यह मर्यादा उत्पन्न्‍ा करती हैं:
यह अश्राव्य है — यह है ध्वनि के किनारे से परे
यह अदृश्य है — है दृष्टि के छलावे के पार
साकार अनुभव संभव नहीं — है वह स्पर्श से परे
एकीभूत है वह सभी विज्ञानों के किसी भी सिद्धांत के
किसी भी परिभाषा से परे

इसका उदय प्रकाश नही फैलाता
इसके डुबने से अँधेरा नहीं होता
वह जो बिना नाम के स्थिर है
और लगातार लौट रहा है अपने अ-अस्तित्व में
रूपहिन बिना किसी आकार या छवि के
अस्पष्ट, धूमिल — इसके सभी नाम औचित्यहिन हैं

जो उसके समक्ष हो उसके दर्शन नहीं कर पाता
जो इसका पालन करते है उसको ढुंढ नही पाते
इसका नियम सभी काल एक कर देता है
वर्तमान को वह नियंत्रित करता है जो इसका पालन करता है
और जगत के समस्त स्रोतों का साक्षी बन जाता है

दाओ का शाश्वत सूत्र इसी नियम को कहते है

१५

दाओ के अनुगामी प्राचीन लोगों ने घटनाओं के सार में इतनी गहराई से प्रवेश किया
कि जो लोग अनभिज्ञ है उन्हे समझने मे कठनाई होती है
इसलिए मैं उनके व्यवहार का एक चित्र प्रस्तुत करुंगा
जिसमे आपको उनके जगत के प्रति दृष्टिकोण की बाहरी छवी मिलेगी:


जीवन के प्रति वे इतने संवेदनशिल थे
जैसे नदी से होकर गुजरता कोई बर्फ हो
व्यवहार मे इतने सावधान और सतर्क
मानो शत्रू आक्रमन करने वाला हो
धुर्त नहीं थे अपितु एक सादे सिधे पेड़ के समान
व्यवहार मे अतिथि सम्मान तत्पर शालीन थे
जैसे बर्फ हो पतली वसंत की
जैसे किसी उत्तरदायी घर की छत जहाँ प्रतिक्षा हो सखा की
अभेद्य ऐसी जैसे पहाड़ों से नीचे दौडती कीचड़ की बाढ़ हो


वे दूसरों को समझ ना आये
किंतु वे संदिग्धता का स्पष्टीकरण देने में सक्षम थे
और अकर्म अवस्था मे रह कर
दूसरों को कार्य मे सफलता के लिए प्रेरित करते
उन्होंने दाओ को मजबूती थाम रखा था
जीवन की आवश्‍यकता की परिपुर्ती से
उनकी इच्छा आकांक्षांए नगन्य हो गयी थी

उन्होंने शांति को दीनता के साथ पाया
कुछ नया नहीं किया

१६

चेतना को पूर्ण विश्राम दे कर
मैं उस परम शून्य की अमर्याद अवस्था को पा जाऊंगा
सो घटनाओं का मेरा निरीक्षण नि:शब्द होगा
यह परिघटनाएं से जीवन के झोकें से खिल उठेंगी
वे धीरे-धीरे स्वयंके स्रोत पर लौट रहे हैं
शांति की ओर लौट रहे है रिक्त होने के लिए :
किसी अंतिम विकल्प बिना सभी का प्रारब्ध यही है

इस शाश्वत उपलब्धी के चक्र को
स्थायित्व-स्थिरता का नियम कहते है
इसके संज्ञान का अर्थ आत्मसाक्षातकार है
बुराई के प्रभाव में है इसके उपेक्षक
इसका स्वीकार कर्ता स्थायित्व-स्थिरता पाता है
प्राकृतिक न्याय इनके साथ व्यक्त हुवा
जीस दैवी नियम से हमारा जगत नियंत्रित करता है
वही एक वास्तव है जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता:
जो मृत्यु-क्षय से नियत होते शरीर के बिना है
दाओ का अस्तित्व अनंत, असिम है

१७

जो विश्वास के पात्र नहीं
दूसरों पर जिसका विश्वास नहीं
जिसका व्यवहार सबसे निकृष्ट है
उसका हर कोई तिरस्कार करता है

सफलता की अति उपेक्षा :
सभी के लिए भय का कारण है

अधिक प्रेम एवं सम्मान से
उत्तमता प्राप्त होगी

वही नेता सर्वश्रेष्ठ है
जो जाना-पहचाना न हो
भाषणों के बिना वह
लक्ष्य सहज प्राप्त करता है
और लोग समझते हैं
की सब कुछ अपने आप होता है

१८

लोग जब स्वयं में दाव पथ खोते हैं
समाज उन पर नियम थोपता है
जब व्यक्ति के जीवन में विवेक न हो
नागरि-परिवारीक ऋण बंधन लगने लगते है

और धुर्त सिद्धांतों के प्रकोप ने पाखंड, तिरस्कार, प्रतिरोध
का आविष्कार किया

जिस परिवार में सब कलह करते हों
वहां एक दूजे को दायित्व याद दिलाया जाया है

ऐसे ही ऐसे देश में जहां कानून व्यसस्था ठिक न हो
देशभक्ति, कर्तव्य पालन और नियम निश्चित करने की मांग उठती है

१९

जब न ज्ञान था, न विद्या
लोग सौ गुना अधिक खुश थे
ना वस्तूएं बनाते पेशेवर थे
नाही थे मुनाफा खोर व्यापारी
इसलिए मूल संकल्पना अपराध के लिए नहीं होती
यदि कोई निती नियमों का प्रतिबंध न हो
यदि व्यक्ति के शुल्लक व्यवहार को नियंत्रित करने का यत्न न हो
तब लोग अपने पारिवारिक संबंधों में सहज सामंजस्य स्थापित करेंगे

ये उदाहरण जो कहते हैं
वह इस प्रकार बताना संभव है:
सरलता वही है जो एक ज्ञानी के लिए सबसे उपयुक्त हो
लकड़ी के टुकड़े की स्वाभाविकता के सम, किसी साफ पटल समान
इच्छा आकांक्षा त्यागने के लिए
बुद्धिमान व्यक्ति अहंकार सदा के लिए दूर करे

२०

बुद्धिमान व्यक्ति सदैव
ज्ञान से पीड़ित होता है
क्या यहां सम्मान और द्वेश में बहुत अंतर होगा?
या क्या आप दया और बुराई में अंतर देख सकते हैं?
दूसरों को डराने वाला स्वयं में भय भरता है

मानो मेरा अभी-अभी जन्म हुवा हो,
जैसे बिना अपेक्षा जगत का दर्शन करता
हृदय मे आश्चर्य लिये फैले नेत्रों वाला नवजात हूँ कोई
वह धाम कहाँ है जहाँ मुझे मेरी शांति मिलेगी?
मैं इसे खोजने के समीप भी पहुंच सकुंगा इसकी कोई आशा नहीं
जैसे असहाय नन्हे पत्ते की तरह नदी की धारा मे बहना

दूसरों की कुछ राय है सभी के बारे में
रत्तीभर संदेह बिना स्वयं पर भरोसा है
और केवल मैं ही दिन-रात अकेला अँधेरे में भटकता
बिना ज्ञान के बचपन से गूंगा हूँ
जो सभी के लिए स्पष्ट हैं, उन अवधारणाओं के लिए मुझे स्पष्टिकरण नहीं मिल रहा है
जैसे जीवन रूपी समुद्र की तलहटी में पडा सपने देख रहा हूँ
उज्ज्वल क्षमताओं और प्रतिभाओं से चमचमाते सभी लोग
सफलता की खोज में अपने गंतव्य को जा रहे हैं
केवल मुझे बिना रुचि के निर्थक ही लहर पसंद है
जो कंपीत नही होती तो स्थान घेरती है
जैसे समुद्र पर मंडराती हवा को भेज रही हो
प्रकृति पर पोषित हो कर मैं किसी
मामुली मानवीय वर्तन का स्विकार नहीं करूंगा

२१

दे की सीमाओं को दाओ सुनिश्चित करता है
दे का सार दाओ से आरंभ हो अनुसरण करता है दाओ-स्रोत का

दाव स्वयं ही है एक अद्भुत पहेली
इसके भावों में भी आश्चर्यों का मार्ग होता है अभिव्यक्त

छिपी हैं धुंध की गहराइयों में हर वस्तू की छवियाँ
संरक्षित है इसकी दुर्बोधता में हमारे जीवन की सामग्री
अस्तित्व का भ्रूण निहित है इसके कल्पनातीत अंधकार में
संभवतः कोई यथार्थवादी चिंगारी
प्रकृति की एक बोध है इन सभी में


और प्राचीनकाल से वर्तमान तक
सभी ने यत्न किया है इसे स्पष्ट करने का
इसके भिन्न नामकरण का, आकलनिय, कम अपरिचीत बनाने का प्रयास हुवा
समानता के आवश्यक उपकरण रूप में सेवारत करने के लिए
प्रत्येक घटना का उद्गम जैसे यही होता हो

२२

सुधार के भ्रूण को त्रुटी संरक्षित रखती है
कुटिल हमेशा सरलता का अवडंबर करेंगे
केवल वही भरा जा सकता है जो कुछ रिक्त हो
कुछ पुराना हो तो नवीनीकरण की संभावना है
क्रय को अवसर देती है आपूर्ति की कमी
जहा अधिकता हो तो हानि, निष्कासन की संभावना भी अधिक है

वह आग्रही नहीं, किंतु योग्य है
उसे गर्व नही, अपितु लोगों को आह्लादित कर उनका अभ्रिप्राय लेता है,
दूसरों के लिए उसका आचरण एक वस्तुपाठ है
चाहे सत्तापर विजय प्राप्त हो किंतु वह उस पर गर्व नहीं करता
उसकी किसीसे प्रतिस्पर्धा नही,
ऐसा कोई नही जो उसका प्रतिद्वंद्वी बनकर उसका स्थान ले सके

क्या यह प्राचीन कहावत सत्य नहीं:
"योग्यता का बीज त्रुटि मे है"?
अपनी पूर्णता की दिशा मे आगे बढने के रूप में
स्‍थान-परिवर्तन का स्वीकार करें

२३

शीघ्र गुजरती है प्रात: तेज हवा
और भारी वर्षा शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी

प्रकृति हर अभिव्यक्ती में मितव्ययी है
और हम उसके बारे में क्या कहें जो प्रकृति से सामंजस्य का यत्य भी न करता हो

क्या उसे एक वचन भी नहीं रखना है
और विशेष विषय में चर्चा न करता हो?

अपने जीवन को दाओ की सेवा समझे
वह अपने जीवन पथ पर आश्वस्त है
जो जीवन को दे की सेवा के रूप में देखे
उसका पथ उसकी कार्यपुष्टि करता है
जीवन के प्रतिसाद से उसे आनंद प्राप्त होगा
जो वह स्वयं को सम्यक बनाए
और ये जो जिंदगी को मुसीबत-नुकसान का रास्ता देखते हैं
संकट में अपराध बोध प्राय: उन पर निर्भर करता हो
और वे इससे मुक्त न होंगे

अतीत में सदियों में कयी वर्षों से कहा गया है
"योगदान श्रद्धानुसार होता है"

२४

चौडाई मे चलोगे — लंबी दूरी पार न कर सकोगे
सभाके के समक्ष स्वयं को प्रकट करोगे — तो ना प्रेम मिलेगा ना सम्मान
हठपूर्वक आत्मस्तुति करोगे — महिमा का लवलेश भी न होगा
आक्रमण में — सफलता नहीं है
घमंड से — तुम नेता न बन पावोगे

हम सभी किसी उससे अपथ्य कर रहे हैं जो अनावश्यक एवं उपद्रवी है
अपने जीवन को यदि दाओ मार्ग के अनुसार बनाना हैं, तो उनके साथ सत्य से चलना होगा

२५

वह है शांत, मौन, भिन्‍न अनुभूत
स्वयंभू सदा के लिए पर्याप्त
"वह" "अपनी" गती में है, कुछ भी न व्यय किये बिना
हर घटना में असीम होकर "वह" है अंतरभूत
निर्माता है "वह" बाकी सब का

मैं "उसे" एक "बड़ा" सा शब्द संलग्न करूंगा
क्या अर्थ है "बड़ा" का ?
विराट है वह विचार के लिए
आपको लगता है की आप "उसे" समझ रहे है किंतु ... "वह" है बहुत दूर
और समय फिर से हमें अवधारणा में ले खिंच लाता है

क्या संज्ञान का कोई महत्वहीन विषय
विराट के आकलन करने की चेष्टा कर रहा है?

सत्य है, अनंत है दाओ, असीम है दावो
ना उस संप्रभुता की और ना नियम की सीमा है दाओ प्रवाह की
ना इस जगत के अनगिनत भौतीक वस्तूओं की गीनती है जो
दाओ के नियम से कार्यरत हैं
अपितु ज्ञान प्राप्ती की तृष्णा, महत्वाकांक्षा क्षीण तो नहीं
और भौतिक जगत को समझने की क्षमता मनुष्य में है
क्योंकि महान शक्तियों में यह अंतिम नहीं
वस्तू के ज्ञान से स्वर्ग के नियम समझते हैं
और यह उनके साथ घटित होता है जो दाओ का आकलन कर पाते है

मन में ऐसे शब्दों का आकलन, मिमांसा कर दोहराने का साहस करो:
"मैं एक ईश्वरिय देवता या देवी की समान एक मनुष्य हूँ"

२६

पौधे का हल्कापन है जड़ के भारीपन से
इसकी शाखाओं के हलचन की रानी है पौधे की शांतता
और रक्षा करती है आंधी तूफान से

राह चलते बुद्धिमान व्यक्ति को यदि यकायक कोई चमत्कार दिखाई दे
वह ना राह छोड़ता है, ना भार को भूलता है
और उसे लुभा न पायेगा चमत्कार का अचरज
न वह अपने भार को भूलेगा, ना उसकी ओर भागेगा

शासक को ध्यान रखना चाहिए:
प्रजा से घृणा और उनका अपमान असफलता की ओर ढकेलता है
शांत लोग ही है सशक्त शासन की जड़ें
शासक की जड़ें कट जाएं तो वह कहां जाएगा?
सभी यश एवं उपलब्धियां व्यर्थ होगी यदि वह केवल स्वयं लिए हो
अराजक आंदोलनों में सहभागी होकर अपनी शक्ति व्यय करना सस्ता है

२७

उत्कृष्ट यात्री वह है जो कोई पदचिन्ह ना छोड़े
उत्कृष्ट वक्ता वह है जिसे भाषण को किसी को समझाने की आवश्यकता न हो
उत्कृष्ट कलाचित्र या योजना वह है जिसकी ना योजना है ना कलाचित्र
ज्ञानी को यदि दो वस्तूएं रस्सी से नही बांधता
ना उन्हें हजार वर्ष तक न खोलेगा
ज्ञानी द्वार बंद करता हैं
वह ताला नहीं लगाता
और खोलता है उन्हे जो चाबियों से खोलना असंभव है

इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति के दरवाजे सबके लिये खुले होते है
वह सभी से से मिलते हैं आत्मविश्वास और खुले हृदय से
किसी का आगमन निषेध नही
संकटग्रस्त हो या हो अविश्वासी
मनुष्य हो या हो प्राणी
बिना सहाय्यता के कोई नहीं लौटेगा
वह उन को सिखाने के लिए तैयार बैठा है जो सीखना चाहते हैं
इसमें वह आनंद एवं सम्मान अर्जित करता है
लेकिन वह अपने छात्र से बंधा नहीं
वह उन संबधों को रोकता है जो उसे अधिक मजबूती से बांधती हो
तो क्या उनके छात्र अध्ययन मे प्रगती के लिए
ऐसे शिक्षक को अधिक सम्मान न दें

अंतत: त्रुटिरहित ज्ञान
उलझन एवं मूर्खता का समृद्ध स्रोत है

२८

जबकि आप पुरुष स्वभाव से परिचीत हैं
अपने आप में स्त्रियों के गुण भूलना मत:
आपको दो पहाड़ियों के बीच, विपरीत, घाटी बन कर
और, उन दोनों के छाया में रहना है
नवजात शिशु समान समुचा विश्व
तब आप समझ पायेंगे

प्रकाश के विचार में अंधकार मत भूलना
किसी भी "हां" में "नहीं" होती है
और प्रत्येक वाक्य के बाद दूसरा, विपरीत, उसके विरुद्ध होगा
हर एक लकडी का एक "भिन्न्‍ा छोर" और किनारा है
आप स्वयं ऐसे विरोधाभासी संगती हैं
यदि हर स्थिति में विपरितता का स्मरण हो
तो अधिकांश जटिलताओं से बचा जा सकता है
फिर आपकी बुद्धि और ज्ञान सीमा न होगी

गौरव एवं यश के आपके विचारों में
अपमान की संभावना को मत भूलना
आपके शील और अभिमान को सांधे ऐसे मार्ग के समान बनो
दोनों में से किसी एक पर ठहरना इतना सहज नहीं
दोनों में संतुलन से आपका व्यवहार आकर्षक एवं सभ्य होगा
आप सादे लकड़ी सम प्राकृतिक बन सकते हैं, जैसे पेड का टुकडा हो

जिससे काटना संभव हो ऐसे लकड़ी के एक टुकड़े से
हमारी तयारी या काम हो जाता है
इसी तरह बुद्धिमान व्यक्ति विपरीत के अंतर का उपयोग
कार्य एवं विचारों में करता है
लेकिन महान है वह जो है एक-अकेला-एकसंध
और उसे विभाजित या अलग करना असंभव है

२९

किसी रहस्यमयी पात्र सम सुंदर है हमारा जग
हमारे भाग्य एवं जीवन के पहेली से ओतप्रोत
क्या इसे जितना संभव है?
जो कोई इस जगत पर राज करना चाहता है
वह अंत में पराजित होगा
सदैव ऐसा ही हुवा है

जगत में सदा के लिए परिवर्तन स्थायी है
इसलिए इसे हथियाना, छिनना, काबू करना निर्रथक होगा
एक समय बाद सत्ता हथियाने वाले स्वयं आज्ञा मानेंगे
खुलकर सांस भरने वालों का दम घुटेगा
शक्तिशाली शक्तिहीन होगा
सभी व्यसस्थाएं नष्ट होंगी
विजेता उस को नियंत्रित न कर पायेगा जो कभी उसने जिता था

चूंकि बुद्धिमान व्यक्ति के विचारों में इसकी समझ होती है
वह स्वयं को मिथ्या सांत्वना नही देता
और मानसिक रुप से किसी भी वासना, उत्तेजना से बचा रहता है

३०

एक शासक ने ज्ञानी से पूछा कि किस तरह की व्यवस्था उत्तम है
उसे दावो के अनुरूप होने की आवश्यकता क्यों है
उत्तर मिला की उत्तम वह है जो सेन्य शक्ति का उपयोग अनुमोदन के लिए न करे
स्वभावत: हिंसा प्रत्युत्तर सदा का प्रहार के लिए प्रहार होता है
जहां से सैनिक गुजरते हैं, वहां घास तन उगता है
और युद्ध अभियान के पश्चात
विनाश, भूख और दुःख आता हैं

इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति सजक हो केवत तभी हिंसा को चुनावता है यदि कोई अन्य विकल्प न हो
आक्रमण का उत्तर देकर ही जीतता है
ध्येय प्राप्ती बाद वह आतंक नही फैलाता
वह, यश प्राप्ती के बाद, सन्मान और अहंगार में नहीं गिरता
वह धन का चोर नहीं है
यदि उसकी जीत में आशीर्वाद नही
उसकी उपलब्धि का उपयोग सत्ता के सशक्तिकरण मे नहीं होगा

जो जितने बल से उपर उठेगा
जो जितनी ऊर्जा से जय प्राप्त करेगा
वह उतना ही कमजोर होकर मरेगा
यह दाओ के नियम के प्रति असम्मान का परिणाम होगा

३१

बाएं का सम्मान शांती एवं शांत जीवन के साथ हो
युध्द के समय में दाहिने का सम्मान हो
बाया हाथ हमें स्मरण कराता है शांतिपूर्ण दिनों का
तो दाहिना प्रतीक है उदास अंधकार का

युद्ध का शस्त्र एक भयंकर संकेत है — अतिभयानक चिन्ह है वह
और बुद्धिमान शासक केवल अंतिम स्थिति में,
जब कोई विकल्प न हो तभी उसका उपयोग करेगा
यदि वह संयम से काम ले तो विजयी होगा
वह कोई विजयोत्सव नही मनाएगा
ऐसे निमीत्य का उत्सव कौन मनाए
जिससे लोगों की मृत्यू हुवी हो
जो आनन्दित होता हो, उसे जनता की सहमती नहीं मिलेगी

शासक की विजय यात्रा मे
वरिष्ठ अधिकारी दाहिनी ओर खड़े होते हैं
और कनिष्ठ बाईं ओर अपनी पद अनुसार के साथ खड़े रहते है
सम्माननीय स्थानों का वितरण भी
दफन विधी के समान होता है

आखिरकार युद्धपीड़ित कारण बनते हैं केवल कड़वाहट एवं शोक का
विजेता अंतिम संस्कार में आते हैं

३२

दाओ प्रतित होता है एक पूर्ण प्राकृतिक लकड़ी जैसा
इसे सैद्धांतीक नाम नहीं कहा जा सकता और न ही टुकड़ों में विभाजित किया जा सकता है
छोटी से छोटी अभिव्यक्ति में भी
समग्र के अधीनस्थ न होना
इसका कारण है
आकार में यह स्वयं के बराबर है

यदि शासकों और समस्त प्रकार के अधिकारियों के ऐवज में
समाज में ऐसा सिद्धांत लागू किया जाये
तब किसी जबरदस्ती की आवश्यक्ता न होगी
और लाभ के रूप में सभी को सभी का लाभ दिखाई देगा
आत्मसंयम का अभ्यास कर लोग प्रसन्न रहेंगे
चावल के बजाए शहद के बिंदु आसानी से खेतों से एकत्र किया जाएंगे
पृथ्वी और आकाश आनंदमय मिलन में विलीन होंगे...
काश, यह सुंदर सप्न साकार होता — किंतु केवल व्यर्थ
जनता में तो एक नीराला क्रम या अव्यवस्था है

इस अव्यवस्था का आधार है विषमता
एवं सभी प्रकार के गुणों में भेद
और इस प्रक्रिया का साक्षात मुकुट है नाम
हर वस्तू का नाम उसके परिभाषा से आरोपित है
सबंध एवं दूसरों की तुलना में
लाह लेपित लकड़ी के विभीन्न्‍ा सजावटी छापों के समान
आप अस्तित्व और वस्तुओं में अंतर देखने लगते हैं

नामकरण हो या भेद
दैनिक जीवन में सुविधाजनक है
अभ्यास के लिए महत्वपूर्ण है
किंतु इससे जगत की समग्रता की भावना लोप होने का संकट है
इसलिए नूतन शब्दाविष्कार में सीमाओं की समझ उपयोगी है
शब्दभेद बिना सब एक हो जाता है

भिन्न नदियाँ मानो अलग-अलग बहती हो
किंतु यदि आप समुद्र में उनके आंदोलन का अनुसरण करते हैं
तो आप समझ जाएंगे कि प्रवाह में कोई अलगाव नहीं
और पानी एक ही है
फिर भी दाओ असंख्य अभिव्यक्तियों में अनुप्रयोगों का आयोजक होकर एक है
वही सदा एक रहता है जो वास्तव में एक हो

३३

आप बुद्धिमान हैं यदि आप दूसरे की आत्मा के गुप्त सूत्र से परिचित हो
और समझ हो कि आपके ह्रदय कक्ष हल्के या भारी अंधकार से भरे हुए हैं
यदि आप विजय भावना जानते हो तो आप सशक्त नायक हैं
किंतु आप दोगुने सशक्त हैं यदि आप स्वयं पर विजय अर्जित कर पायें, स्वयं को नियंत्रित कर पायें
यदि आप अपनी और अपनी व्यवस्थाओं से संतुष्ट हैं तो आप धनवान हैं
किंतु अपनी आत्मा को नव यश के लिए अपनी स्थिति को सशक्त करने दें

यदि आप लंबी यात्रा में अपने लक्ष्य से ना भटके
तो आपके जीवन कई वर्षों का होगा
और यदि मृत्यु के पश्चात भी तुम स्मृति से मिटते नही हो
तो देह नहीं, अपितु आपकी आत्मा हजारों वर्ष रहेगी

३४

नज़र रखना नदी किनारे पर, दाओ समान हो सकता है बहते झरने का पानी
बाईं या दाईं ओर दिशा की कोई सीमा नहीं
अपने अस्तित्व का ज्ञान न हो ऐसे असंख्य जीव हैं
जिस अज्ञान से जन्मे उसी में लौट जाएंगे
दाओ निर्माता है समस्त निर्जीव वस्तू, सभी वनस्पतियों एवं जीवों का, उसकी अपेक्षा है कुछ भी ना वापस आएं
वह किसी को अपने अधीन होने के लिए विवश किए बिना
सृष्टि की शक्ति से जगत का पोषण करता है

ना इसकी कोई इच्छा है ना है कोई स्वार्थ
सार्वजनिक मान्यता में
जिसे तुच्छ या "दीन" माना जाता है
उसका भी चेहरा निष्पाप है
लेकिन दाओ पूरी दुनिया को आत्मसात कर
किसी को ठुकराए बिना सबका स्वीकार करता है
इसका स्वयं को महान स्वामी का स्वामी न मानता
हमें इसकी सच्ची महानता का उदाहरण है

३५

डाओ मार्ग का अनुसरण से परेशानी को रोके
सब कुछ सदा शांति की खोज में अग्रेसर है
बुद्धिमान व्यक्ति के आनंद के लिए मात्र भोजन की उपलब्धता पर्याप्त कारण हैं
जिसमे वह अनायास ही विश्राम पायेगा

यथार्थतः दाओ स्वयं भोजन का प्रतिनिधी नहीं
और इसके स्वाद, रूप या श्रवण से पहचाना संभव नही
जो इससे आनंद लेना सीख जाता है
उसके एकमात्र आनंद का स्रोत समाप्त नहीं होगा

३६

संपीड़ित से पहले विस्तार की आवश्यकता है
वस्तू को दुर्बल करने के लिए उसकी शक्ती बढ़ने दें
मिटाने के लिए प्रकट होने दो
यदि आप केवल पाना चाहते हैं तो उदारता से उपहार दें
यहाँ वह ज्ञान है जिसके साथ ऐसी दुर्लबलता है
जो जीतने में शक्ती से अधिक सक्षम है

पानी की गहराइयों से बाहर आने से बचती एक मछली समान
राज्य को अपने लोगों को राजनीतिक स्पष्टीकरण देने से बचता है

३७

दाओ सदैव अकर्म की स्थिति में होता है
किंतु कार्य किये बिना किसी को नही छोडता
यदि शासक भी ऐसा कर सके
यह जगत जैसे उसे होना चाहिए वैसे ही खिल उठेगा

किंतु यदि कोई प्राकृतिक परिवर्तन से असंतुष्ट हो
तो वह अनावश्यक महत्वाकांक्षा से बोझिल करेगा
इन वासना एवं महत्वाकांक्षाओं को रोकना होगा
उसे तुरंत आवश्यकता है प्राकृतिक सादगी की संप्रभुता पर लौटने के लिए विवश होने की
ताकि किसी को भी इसके विभूति स्वभाव का विरोध न हो

प्रकृति की नामहीन स्वाभाविकता वासना से ग्रस्त नहीं
और इसलिए यह शांति प्राप्त कर पाता है
व्यक्तिगत इच्छाएं न पर मौन के अद्भुत मार्ग का अनुसरण होगा
तब पृथ्वी पर सुव्यवस्था अपने आप ही स्थापित हो सकेगी

३८

प्रामाणिकता के गुण जितने अधिक हो उतना अच्छा
वे जितने कम हो उतना ही वे स्वयं को प्रकट करने का यत्न करते हैं
उच्च नैतिकता और छोटी-छोटी बातों में सजगता
इनको ज्ञान में रख कर तुलना के मापदंड निश्चित किये जा सकते है

सर्वोच्च पदधिकारी जानबूझकर कार्य नहीं करता
वह लक्षहिन कार्य नहीं करता
और फिर भी जो आवश्यक हो उसे शेष नही छोड़ता

मानवताकी उच्चता का उदय हृदय की पुकार से होता है
और वह मानवीय कृतज्ञता के भरोसे नही रहती

'उच्च न्याय' का विषय आकांक्षाओं से भरा है
सब को यही योग्य लगता है

"उच्च शालीनता" सभी गतिविधियों को अनुष्ठानों के ढांचे के भीतर संचालित करती है
और जो स्वेच्छा से अनुष्ठान का पालन नहीं करते हैं उन्हें विवश करती है

तो हमने पाया कि दाओ के नुकसान से
दे छूट जाती है
दे का नुकसान होने पर भी
मानवता की आस अभी बाकी है
दया की हानि के साथ, नियम अभी भी हर जगह है
न्याय नष्ट होने पर शेष रहती है केवल औपचारिकता

कर्मकांड आस्था का कोरा आवरण है
जब विचार की जल्दबाज़ी हो
व्यथा के समान पूर्वाभास के साथ
अशिक्षा और मूर्खता का आरंभ हो जाता है

इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति आवरण को छोड केवल सामग्री को चुनता है
वह फूलों को नहीं अपितु अपने लिए फलों को महत्व देता है

३९

जिनका अस्तित्व सैकड़ों वर्षों से हैं, उन्हें पूर्णता के लिये आकार दिया गया
स्वर्ग शुद्ध, पारदर्शी एवं रिक्त होने का प्रयास करता है
पृथ्वी को गर्व है अपनी स्थिरता और दृढ़ता पर
जल प्रवाहित हो कर धाराओं की धमनियां भरता है
नहीं थकते जीव जंतु नई पीढ़ी को जन्म देते

शासक इस तरह से बनाए रखता है राज्य की अखंडता को
जब वह स्वयं लोगों के लिए उत्तम गुणों का आदर्श हो

सम्पूर्णता की हानि हमेशा संकट की ओर ले जाती है
जैसे कोई बादल गरज कर स्वर्ग के टुकड़े करता हो
स्वर्ग न करे कि भूकंप से पृथ्वी विभाजित हो
जैसे रिक्त प्रवाह, सूखी नहरें उष्ण मरूभूमी में लुप्त होती है
इसी प्रकार हर जीवित प्रजाति लुप्त हो जाएगी यदि नयी पीढ़ियों को जीवन न दे

यदि संप्रभुता लोगों के लिए पर्याप्त नैतिक ऊंचाई न हो
तो विद्रोह से शासन के विनाश का भय है
क्योंकि उच्च का आधार सदा निचला होता है
अधिकारियों को विवश करता है जनता का समर्थन
तो क्या कोई कारण है कि शासक उनको सम्मान न दे?

संभवत: एक दिन शासक स्वयं को "महत्वहीन" या "दयनीय" या "दीन" कहेंगे
संभवत: इसी प्रकार वह समर्थन एवं करुणा पाने यत्न करेगा
किंतु यह असत्य मार्ग है जो बदले में
जनता की दृष्टी में योग्य पद और गरिमा खोने का संकट लायेगा

जरा सोचिए यदि आप किसी का रथ तोड दे
तो अलग-अलग हिस्से इसपर सवारी संभव नही
क्योंकि सब कुछ उपयोगी है अपनी संपूर्णता में
प्रत्येक भाग का योग्य अनुपात मे होना आवश्यक है
इसलिए, यद्यपि स्वयं को कीमती हीरा मानकर
आत्म-महत्व मे पडना योग्य नही
आपको स्वयं को रास्ते का पथ्थर नही मानना चाहिए

४०

दाओ आंदोलन नकार से उत्पन्न हुवा है
क्रमिकता का चक्र दुर्बलता में है
केवल सभी वस्तुंओं के जन्म का कारक
एवं स्वयं का प्रागटय
अस्तित्व के निषेध से होता है

४१

साधु जब दाओ के बारे में सीखता है, वह उसे साकारने की चेष्टा करता है
साधारण व्यक्ति इसके प्रति उत्साही होता है, आगे चल कर इसे त्यागता है
मूर्ख उस पर हस पडता है
नि:संशय इसमें कोई संदेह नहीं कि दाओ स्वयं हसता होगा

केवल ऐसा मत कहो: अजीब लगता है कि उसने प्रकाश और आत्मा से सभी को भर दिया
साफ मार्ग कौन देख पाता है: ऐसा लगता है कि वह खो गया है
जो आध्यात्मिक ऊंचाइयों छू गया : गिरा हुआ लगता है
उच्च पवित्र व्यक्ति : लोगों की दृष्टि में विकृत होता है
कई उदाहरण हैं इस विरोधाभास के
क्योंकि परम बहुतायत अनजाने में लोगों में दोष की भावना उत्पन्न कर रही है
नकारात्मकता एवं विपरीतता के साथ
सर्वोच्च गुण पर कितनी बार केवल छल का संदेह किया जाता है!
इस बदलती दुनिया की परिवर्तनशीलता में सत्य का पता लगाना कठिण है

श्रेष्ठता सामान्य मान्यता की सामान्य सीमा लांघ जाता है
विशाल वर्गाकृती के कोनों को निर्दिष्ट नहीं किया जा सकता
महान उपहार के लिए दीर्घ प्रविक्षा करनी पड़ती है, और वह अपवाद से प्राप्त होता है
अति तीव्र ध्वनि कानों को नहीं सुनाई देती
दाओ की महान छवि की परिभाषा स्पष्ट नहीं
यह नाम रहित है और वायु समान ओझल हो जाता है
पुन: दाओ जगत का आरंभ करता है
और जगत की सभी प्रक्रियाएं पूर्णता की ओर बढती हैं

४२

दाओ में विभाजन नहीं अपितु वैश्विक एकता का समर्थक है
सुक्ष्म परिक्षण से प्रत्येक वस्तु की एकता में
दो परस्पर अनन्य आकांक्षाएं होती हैं
लगातार बदलते दो ध्रुवीय विरोधी गुण
और वास्तव में परिवर्तनकारी एक तीसरी शक्ति है
जगत मे केवल सांस को परिभाषित करती है यह तिकड़ी
और सभी वस्तुंओ की नींव
जिसमे कुछ सार हो, स्वयं यिन और यांग के गुणों को वहन करती है
और जीवन की त्सी शक्ति की मदद से
संयोजन का सामंजस्य स्थापित किया गया
हम जिसे दोई कहते हैं
वह न्याय एवं सहमति के साझेदारी की उपयुक्तता-सद्भाव-आनंद है

दुर्भाग्य या कठिनाई पर नियंत्रण पाने के इच्छुक
दूसरों की दृष्टी में आनंदित रहने का प्रयास करतें हैं
उन्हें असफल, पराजित कहलाना पसंद नहीं
किंतु सत्ताधारी सौभाग्यशाली एवं धनवान होकर भी
जानबूझकर कहते हैं "हम दीन हैं" या "हम सफल नहीं हो पायेंगे"

जो नीचे है वह चाहता है उत्कर्ष
इसके विपरीत, उदात्त की कामना आत्म-ह्रास है
जिसने हिंसा से अपना पद पाया
वह अपने प्रति हिंसा से भय है
"कठोर जीवन के अध्याय मुझे बहुत कुछ सिखाएंगे"
और बदले में जगत वही मुझसे प्राप्त करेगा"
यह प्रतिबिंब है कहावत के अर्थ का

४३

कोमल वस्तु समय के साथ कठोरता पर नियंत्रण पाती है
और जो सब कुछ है
कुछ नहीं है को सम्मती देता है
बुद्धिमान व्यक्ति इसे समझ कर
सर्वथा अकर्म का उपयोग करता है
शब्दरहित है उनके ज्ञान का शिक्षण
किंतु जगत में किसी के लिए यह दुर्लभ है
जीवन पध्दती के रूप में
वह इस सिद्धांत का स्वीकार करता है

४४

आपको क्या मत है कि शरीर के निकट क्या है: नाम या जीवन
और अधिक मुल्यवान क्या है: जीवन या जीवन की संपदा
क्या यह सत्य नहीं है कि प्राप्त करना
पराजय से उबरना से कठिण है
व्यक्ति जितना अधिक धन, वैभव और यश संपन्न हो
पतन उतना ही अधिक होगा
जितना अधिक भावनाएँ जीवन को अवशोषित करेंगी
अनुमान उतना ही कठिन होगा
जो उपाययोजना करते हैं केवल वे ही
लज्जा एवं कठिणाई से बच पाते है
और उनको दीर्घ जीवन का लाभ होता है

४५

घूमते चक्र के किनारे के निकट क्या होता है
पूर्ण निर्दोष का चेहरा मर्यादा के बाहर निर्मम है
सभी सीमा में बंद है अखंड परिपूर्णता हो या शून्यता
महान कला विचीत्र, भंगुर एवं अकुशल लगती है
सटीक प्रयास से सुनते हैं हम हकलाता वाक्य
अतिसुंदर शब्दों की सच्चाई केवल विरोधाभास में मर्मज्ञ है
पता है कि हलचल ठंड हरती है
और अत्यधिक गर्मी से मुक्ति के लिए हम इसमे देखते हैं सुख
हमारी भावनात्मक उथल-पुथल में जगत के रहस्य का जब होता है प्रवेश
इसकी समग्र आकलन के लिए सरल विचारों की शांती प्रकाश प्रज्वलित करती है

४६

यदि कोई देश दावो एवं दे से क्रियान्वित हो
घोडा खाद से खेत की गुणवत्ता को शांतिपूर्वक सुधारते है
यदि किसी देश में दावो एवं दे न हो
युद्ध के उपकरण के रूप में घोड़े पर सवार सड़कों पर दौड़ते हैं

असीमित वासना प्राकृतिक आपदाओं से भी अधिक भयानक हैं
अधिक पाने की तृष्णा किसी भी प्रकार के नुकसान से अधिक विनाशकारी है
परिपुर्ती के मार्ग को जाने बिना इच्छाएं लूटपात से भी बदतर हैं
सुख और आनंद की प्राप्ती उसे होगी जो अतिरिक्त आवक न चाहे
उपभोग से अधिक आवक अतिशयोक्ति मात्र है

४७

जगत को जानने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं
वह जो आगे भागे: कम जानता है: जबकि वास्‍तविक रहस्य अभी है
और जल्दी ही तुम्हारे समक्ष, तुम्हारे हाथ में होगा
बुद्धिमान को स्वर्ग का मार्ग समझने के लिए खिड़कियाँ खोलने की आवश्यकता नहीं
उसे बाहर देखने की जरूरत नहीं
वह तो वस्तुओं की बाहरी उपस्थिति के बिना है
वह उनके योग्य एवं उपयुक्त नामों का चयन करता है
वह बिना किसी क्रिया या किसी समस्या के सब कुछ नष्ट करता है

४८

वे जो अभी सीखते हैं, ज्ञान को एक सूची में जोड़ देंगे
वह जो दाओ मार्ग पर है: उसकी समस्त ज्ञान प्राप्ती लुप्त होगी
एक बिंदु तक उसको क्रिया की आवश्यक्ता नहीं
और इस तरह वह निष्क्रियता की स्थिति को प्राप्त करता है
एक सच्ची निष्क्रियता कर्मों को अधूरा, अपूरा नहीं छोड़ती
कर्म और प्रतिबद्धता के बिना निष्क्रिय होकर, ध्यान आकृष्‍ट किए बिना पूरी दुनिया को हरा पाता है
किंतु अपनी इच्छा को दूसरे लोगों पर थोपने से कोई फायदा नहीं

४९

बुद्धिमान व्यक्ति की आत्मा में हम सदैव समान गुण नहीं देख पाते
उनके संपर्क में आने वालों के साथ उनके संवाद में ऐसे परिवर्तन सुधार करते हैं

अच्छे लोगों की संगत में, वह निश्चित रूप से सदा अच्छा होता है
वह बुरे लोगों को भी दया से उत्तर देता है
इस प्रकार वह अपने हृदय, खुलेपन और सुंदरता का विकास करता है
जो विश्वासपात्र हैं उनके लिए वह विश्वसनिय हैं
पर जो भरोसे लायक नहीं, वो भी विश्वास से ही मिलता है
इस प्रकार वह किसी से मांगे बिना आत्मा की पवित्रता बढ़ाता है

वह लोगों की आत्मा से, आभूषण या कभी-कभी केवल कचरा बटोरता है
ना करता है अच्छे या बुरे में भेद
वह दुनिया को एक बालक की दृष्टी से देखता है
बिना निर्णय या विकल्प के
सब कुछ हृदय में फिर से शुद्ध सद्गुण में विलीन होता है

५०

जन्म के समय से और दुनिया के प्रवेश द्वार पर
पहले से ही हर मनुष्य का जीवन का अवधी कम पड रहा है
विकसीत हो रहे हैं दस में से केवल तीन
अन्य तीन सड़क के एक छोर पर हैं
मौत के लिए दौड़ रहे अन्य चार
जीवन के आंदोलन में पडे हैं
ऐसा इसलिए है क्योंकि वे बहुत ज्यादा जीना चाहते हैं

जबकि लोग कहते हैं:
जिसने जीवन की अंतिम ज्ञान की खोज की
वह जंगली जानवरों के आक्रमण से बच सकता है
उसके शरीर पर ना लोगों के हथियार चलेंगे
ना गैंडे का सींग भोकने का कोई स्थान है
और बाघ के पंजे के लिए कोई जगह नहीं
ना चाकू मार पाता है कोई हमलावर
इसलिए केवल की मृत्यु के पास प्रवेश का कोई आधार नहीं

५१

दाओ ब्रह्मांड के सभी वस्तुओं के निर्माण मे अथक रत है
और दे उसे पोषण और शिक्षा देने में रत है
भौतिक शब्दों में: यह सभी वस्तुओं के निर्मीती का आधार है
उनके सहवास में एवं विकास की परिस्थितियों में
परम पूर्णता प्राप्त करने की संभावना अंतर्भूत है

इससे जग तैयार है दाओ के अनुसरण के लिए
और दे का हर विषय प्रशंसा एवं सम्मान पात्र है
सहज एवं बंधनकारक नही
जैसे प्राकृतिक वस्तुएं सहज गतीमान है
क्योंकि दाओ सभी का निर्माता है
भरण पोषण, संवर्धन, विश्रांती दे कर
शत्रुओं से रक्षा करने के लिए
दे को साधुवाद है

बंधन या धारण किए बिना सृजन करो
अपनी रचना में गर्व न हो
दूसरों पर हावी या विरोध किए बिना व्यवस्था करो
यहां वे सिद्धांत दिए गए हैं जो अनुकरणिय है
उन के लिये दे के साथ रहना चाहते है

५२

हर वस्तु का अपने मूल एवं अतीत में विकास होता है
माना जा सकता है कि इसका कोई कारण है
आवश्यक है उन कारणों को समझना
परिणामों में उनकी अभिव्यक्तियों के खोज के लिए
परिणामों को जान कर स्मरणिय है कि इसके कुछ कारण थे
तब आप संकट से नहीं डरेंगे

हर कोई जानता है कि शांत भावनाओं से
और जगत से संपर्क के दरवाजे बंद करके
हर मनुष्य बिना किसी कठिनाई के जीएगा
किंतु यदी आप अपने भाव भावनाओं को त्याग दे
और इंद्रियों के अतिरिक्त जिम्मेदारी संभाले
आप मृत्यु तक अपनी समस्याओं को न छोडेंगे

वैचारिक स्पष्टता आपको अगोचर विवरणों को समझने में सहाय्यक है
विचार की शक्ति से आप बच निकलने पर भी उसे बनाए रखेंगे
पहचान के लिए प्रकृति में कारण के प्रकाश का उपयोग करें
तो आप जगत को स्पष्टता से समझेंगे
और इसके भागों में एकत्व होने से दूसरे को प्रभावित कर
आप स्वयं को या दूसरों को नुकसान नहीं पहुंचा सकते
"सातत्य का पालन" इसे ही कहते है

५३

दाओ के ज्ञान की इच्छा एक अद्भुत महान मार्ग की ओर ले जाती है
उस मार्ग पर चलने से उसके पथिकों को समस्या नहीं होगी
मार्ग से उतरने वालों को ही भय होगा
दाओ मार्ग प्रशस्त एवं बिना किसी मोड़ के सीधा है
किंतु लोग साधारणत: संकरे पथ पसंद करते हैं

शासक शानदार, आलीशान कक्षों में, महलों में
घमंड में रहते हैं और वे ध्यान नहीं देते
कि उनके देश के खेतों में मातम हैं
ना जनता को पेटभर रोटी है
वे धन संग्रह कर रहे हैं, अपने शरीर पर कीमती आभूषण लटकाते
इंद्रिय तृप्ति में डूबे है
उन्हे घृणा है अच्छाई से
उन्हें बढाईखोर और लुटेरा कहा जाता है
उनका उतावला दुर्व्यवहार दाओ से विपरीत है

५४

जिस दीवार के निर्माण में सैकड़ों साल लगे
उसे तोड़ना कठिण होगा
आदतों के प्रभाव सहज नहीं
पूर्वजों का सम्मान करना वंशजों की सदा परंपरा रही है
वास्तव में दे का स्वामी होना चाहिए
जो खुद मे सुधार का प्रयास करे
जो अपने परिवार को बेहतर बनाने में मदद करे उसके लिए दे प्रचूर है
जो अपने नगर को सुधारता है, उसके पास बल दे शक्ति होती है
दे उनके लिए फलदायी है जो इससे देश का निर्माण करते हैं
वह जो जगत मे सुधार का साहस करता है, उसे अनंत दे के आशिष है

आप इनमें से किसी एक नियम को सुधारने का प्रयास करे
आपकी देखभाल का उद्देश्य आप पूरी तरह समझ जायेंगे

आप अपनी सीमा तक पहुँचने का यत्न करें
तो आप अपने आप को विस्मय से देख सकेंगे
यदि आप पारिवारिक पूर्णता कि ओर प्रयास करे, तो आप परिवार मे नया प्रकाश देखेंगे
किसी शहर या देश को सुधारने के प्रयास में
आप उन्हें बेहतर समझ पाएंगे
जागतिेक सुधार की कामना करके
आप इस ग्रह पर सब कुछ सीखेंगे

जगत ये रहस्य मेरे लिए खोलता है
क्योंकि मैं एक भक्त बन कर उस रास्ते का अनुसरण किया जो दाओ ने दिया था

५५

दे पाने वाला व्यक्ति है नवजात शिशु समान
बालक को सदा जग से आशीर्वाद मिलता है
चाहे शिकारी हो या पशू या फिर पक्षी, उसकी रक्षा करते हैं
वह छोटा एवं दुर्बल होकर भी उसमे विशेष जीवन शक्ति है
वह उदाहरण है संपूर्णता समग्रता का
यौन रहस्यों से वह परिचित नहीं अभी तक
दिनभर उछलकुद करता है बिना थकान या थकावट के
सराबोर है सद्भाव से और उपयुक्त है प्राकृतिक जीवन के लिए

बुद्धिमान के लिए अनुसरण की निरंतरता है सामंजस्‍य
निरंतरता के ज्ञान का अर्थ है आत्मज्ञान
रोमांच, चिंता एवं विवंचना से भरे जीवन मे
समृद्धि एवं आकांक्षा को यश एवं महत्वाकांक्षा से लाभ होता है
मनुष्य को आनंद के कुछ क्षण मिलते है
किंतु ऐसा जीवन ऊर्जा के अनावश्यक ग्रहण का कारण हो जाता है
कितना भी आकर्षक हो, इसका दाओ से कोई संबंध नही
यह ऐसा है जैसे बहार के बाद फूलों का तेजी से मुरझाना
दाओ का पालन न करना मृत्यु को गती देता है

५६

जो जानता है वह समझाने का प्रयास नहीं करता
जो समझाता है वह अपनी बात को नहीं समझता
जब आप अपनी भावनाओं को शांत करने की व्यवस्था करते हैं
बाह्य जगत के सभी द्वार बंद कर
सभी स्नेह संबंधों को मुक्त कर
संवेदनाओं की तीक्ष्ण धार से बच कर
जीवन तेज के शांत ओज मे परिवर्तन के लिए
बिना व्यर्थ विचारों में रुके, व्यर्थ उतार-चढ़ाव से मुक्त होकर
जगत के साथ रहस्यमयी एकता को पाकर आपका विजय होगा

बुद्धिमान जो यहाँ तक पहुँचे, उसका न कोई मित्र है न शत्रु
न वह किसी के निकट है, न कोई उसके निकट है, न किसीको वह अस्वीकारता है
ना अच्छा करता है, ना बुरा करता है
उदासीन है वह अपमानना या महिमामंडन के प्रति
वैसेही उदासीन है हानि या भौतिक धन के लिए
इसलिए सारा जग
उसको सम्मान दे कर सम्मान पाता है

५७

देश का शासन चलता है स्थापित आदेशों से
गैर-मानक नीती से रणनीतिकार को युद्ध जीतने में मदद होगी
किंतु सारे जग पर राज संभव है केवल तभी
यदि वह कर्म से मुक्त हो

सभी प्रकार के निषेधों की गिनती वास्तव में
साधारनत: गरीबों की बढ़ती संख्या की ओर जाती है
अधिकारी जितने कठिण प्रतिबंध लागू करते हैं
उतनी बढ़ती है शस्त्रों की संख्या
और बढ़ती हैं राज्य में समस्या
शिक्षा भयावह नवाचारों की ओर ले जाती है
और कानूनों और विनियमों के समूह बनेंगे जितने अधिक जटिल
उतने अधिक अपराध परिष्कृत एवं विकसित होंगे

शासक यदि वह बुद्धिमान हो तो ध्यान दे
यदि वह कठोरता से बचता है
सब कुछ अपने आप सुंदर हो जाएगा
विकृतियां अपने आप ठीक हो जाऐंगी
जब सत्ताधारी शांति बनाए रखता है
जनता के पास आत्मसमृद्धी के अधिक अवसर होते है
जब राज्य उनके साथ हस्तक्षेप कर उन्हें दुर्लबल बनाता है
यदि संप्रभु अपनी इच्छाओं एवं वासनाओं को मिटा दे
जनता प्राकृतिक स्वास्थ्य की ओर लौटने लगेंगे

५८

नागरिक सरल हृदय के बनते हैं कुटनीतीक सुसंवाद से
कठोरता केवल कपट का कारण बनती है
सुख का आरंभ दुखों एवं आपदाओं में निहित है
और अगली आपदा की जड़ें
अभी के सफलता में निहीत हैं
हमे कहाँ ले जाएगा यह अनंत चक्र?
जो कुछ योग्य है वह निश्चित ही विकृत हो जाएगा
सभी योग्य वस्तुओं को अभिशाप में परिवर्तीत होने का अभिशाप हैं
और शाश्वत हैं मानवी भ्रम, भ्रांतियां एवं भ्रांमकता

इसलिए एक बुद्धिमान शासक दृढ़ होता है किंतु क्रूर नहीं होता किसी से
वह सरल, प्रामाणिक, सरल हृदयी होकर दूसरों की कमी को जानता है
नैतिकता का पालन कर, वह असहिष्णुता से बहुत दूर है
यदि जीवन उद्देश्यपूर्ण हो, किेतु लक्ष्य प्राप्ती के लिए उतावला न हो
वह किसी भी ज्ञान के प्रकाश से प्रभावित न होगा

५९

प्रकृति के नियमों के अनुसार जनता पर शासन करने के लिए
शासक को अपने समस्त कार्यों में संयमी होना चाहिए
नकारात्मक परिणामों से बचने के लिए
विरोधी परिणामों के विचारो को तिलांजली देनी होगी
हर स्थिति मे कौशल को सशक्त करने के लिए उसे अभिप्राय की आवश्यकता है
तब उसके प्रयोजन का विरोध नहीं होगा
इस बात से उसे आपत्ति न होगी कि वह क्या कर रहा है :
न होगा बंधन उस पर कोई बाहरी शक्ति का
यदि वह विवेकपूर्ण संयम का पालन करने में सक्षम हो

राज्य एवं मातृत्व से समानता है:
एकता से समग्रता में बांधता है यह विभाजीत जनता को
उद्देश्य है प्रजाति के निरंतर अस्तित्व का
यदि शासक यह समझ ले
वह अपने कंधों पर मातृत्व की उत्तरदायित्‍व लेता है
उसके सत्ता की जड़ें सशक्त होंगी
वह जगत के जीवन को दीर्घ करेगा
भविष्यदृष्टा बन कर भविष्यवाणी कर पायेगा

६०

छोटी मछली के स्वादिष्ट व्यंजन पकाने की इच्छा होती है
श्रम, कला एवं धैर्य महान निवेश है
यह राज्य के लिए सत्य है प्रबंधन के संबंध में
जब शासक प्रबंधन में दाओ के साथ एकजुट होना चाहे
तो शीघ्रता, अधीरता, हिनता, अवमानना एवं विवरण उपेक्षा की आत्माएं
उसके कार्य को पूरा कर हिसाब रखने में हस्तक्षेप नहीं करेंगी
और वह स्वयं प्रजा को नुकसान नहीं पहुंचाएगा
किंतु आपसी दे स्थापित हो जो सभी को सशक्त करे यह अच्छा है

६१

हमे ज्ञात हैं कि सभी सड़कें रोम या यरुशलेम की ओर जाती हैं
एकाग्रता का स्थान है हर महान राज्य
जैसे नदी में एकत्रित हो असंख्य जलधाराओं के प्रवाह
उनकी गति पूर्ण होती है केवल महान महासागर में पानी मे
लोग चरित्र और व्यवहार में इसी प्रकार भिन्न होते हैं
सांघीकता का केंद्र राज्य में होने के कारण
उसमे एकसंघ जीव का निर्माण होता है

हम अबला में राज्य का सादृश्य पा सकते हैं
बाह्य रुचि पर ध्यान देना
पुरुष पहल की आज्ञाकारिता से विजय प्राप्त करना
केवल अवशोषन की गतिविधि है उसकी निष्क्रियता
वह सदा दुर्बलता से पुरुषी शक्ती पर विजयी होती है

बडे देश के लिए, एक छोटे समस्याजनक पड़ोसी के साथ उसके संबंध
समय के साथ धीरे-धीरे समाप्त करने के लिए निष्क्रियता पर्याप्त है
और वह छोटासा देश यदि उस बडे देश के पिछे न पडे
तो नया बुनियादी ढांचा प्राप्त करेगा
उन स्थितियों में उन दोनो पड़ोसियों के कुल आकार मे वृद्धी होगी

हर कोई मिलन से जीतता है
बड़े देश को नए नागरिक मिलते है
और छोटे देश की जनता को मिलते है अवसर
जो उनके लिए पहले अज्ञात थे
हर किसी को वो मिलता है जिसकी चाह थी
लवचिकता महानता की ओर ले जाती है यह इससे बोध होता है

६२

दाओ प्रतिनिधि है सभी घटनाओं एवं वस्तुओं के अंतरतम सार का
प्रकाश का समर्थन है, "सुंदर" एवं "अच्छा" और अंधेरे का है "बुरा" एवं "अयोग्य"

ऐसे शब्दों की सराहना कौन करे
कौन करे सुंदर वस्तु एवं कृत्यों का गौरव
जब की इसके विपरीत
उसे स्वयं कोई बुराई या अच्छाई ज्ञात न थी?
आलीशान महल से निकल जाने के पश्चात
क्या होती है किसी उच्चाधिकारी की अवस्था
क्या ऐसे बुद्धिमान की सराहना करना बेहतर नहीं
जो विनम्रता से बैठे और दाओ सीखने का प्रयास करे?

संभवत: दाओ का बहुत आदर और सम्मान करते थे प्राचीन लोग
क्योंकि उन्होंने इसमे वास्तविक मूल्यों का सही प्रमाण पाया
उन्होंने सभी प्रकार के खजाने बटोरने का यत्न नही किया
न अपनी अपरिपूर्णता देखने की क्षमता खोई
उन्होंने हिंसा के बिना इसे दूर करने का प्रयास किया
इस प्रकार स्वर्गीय साम्राज्य में दाओदय में अपना योगदान दिया

६३

शांति को प्राथमिकता देकर अकर्म बने रहे
और किसी अप्रिय वस्तु के स्वाद का अनुभव करें
थोड़े में अधिकता खोजो, छोटे को महान जानो
प्रकोपी श्रापों का निर्मल दे से उत्तर दो
जो कठिन हो उसका शैशवावस्था से ही अभ्यास करें
छोटे से अंकुर से महान कार्य आरंभ करें
क्योंकि हिन लोगों से उत्पन्न होती हैं जटिल समस्याएं
छोटे छोटे कदम होते हैं लंबे मार्ग में

बुद्धिमान व्यक्ति निर्माण नहीं करता न संजोता है महान योजनाएं
यही कारण है कि वे उसके लिए साकार होते हैं
जिसका आसानी से व्यापार हो वह शिघ्र ही आसानी से असफल होगा
जो केवल आसान माग्र तलाशतने वाला अपने लिए इसके विपरीत कठिनाई पायेगा
किंतु बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी कार्य में बाधाओं का सामना करने के लिए सदैव तत्पर होगा
फिर समस्याएं जमा नहीं होंगी
उसे अनसुलझी समस्या का सामना कभी भी नहीं करना पड़ेगा

६४

आसान है गतिहीन को जीतना
और आसान है अनिर्णीत से निपटना या जुझना
आसान है नाजुक को धुल में मिलाना
हवा से छोटे टुकड़े अधिक तेज़ी से दूर फैलेंगे
उद्यम कर उससे निपटो जो अभी तक सामने नहीं आया
आदेश ले लाओ तो अस्वस्थता का भूत आप देखेंगे
दो परिधि के व्यास से बढता ओक बाँजफल से निकलता है
एक बड़ी मीनार मिट्टी के एक छोटे से ढेर से शुरू होती है
और कई सौ मील लंबा मार्ग
आपके पैरों के नीचे आरंभ होता है

अतिसक्रिय अपना कार्य भ्रष्ट करेगा और लालची की हानी होगी
अधिरता से सफलता की दहलीज पर पराजय का सामना होगा
बुद्धिमान व्यक्ति कर्म नहीं करता इसलिए असफलता में नहीं गिरता
उसके बिना, वह पराजीत नहीं होता ना धनवान बनने के लिए अधीर होता है
सदा सावधान होता है कार्य के अंत में एवं आरंभ में
वह कार्य सफलता पूर्ण करता है
बुद्धिमान व्यक्ति कामना करता है अनिच्छा की
बहुसंख्यक सराहना करते है वह उसकी प्रशंसा नहीं करता
वह समझ से उच्च कुछ सीखता है
लोग जिसे लावारिस छोडते हैं वह उसे लौटता है
प्राकृतिक वस्तुओं का सहज समर्थन कर
वह उन्हें प्रभावित करने की चेष्टा नही करता

६५

वे पुराने जिन्होंने दाओ को पूर्ण समझ लिया
जन-साधारण की रक्षा का प्रयास किया
अधिकारियों के कार्य कलापों को जान कर
सरकारी तौर-तरीकों की अनभिज्ञता में उन्होंने अपने लोगों को त्याग दिया
जब जनता अधिकारियों और शासक के बारे में बहुत कुछ जानती हैं
देश प्रायः दिवालिया और बर्बाद हो जाता है
इसके विपरीत : यदि कोई अनावश्यक समाचार या प्रचार न हो
देश में समृद्धि की वृद्धि होती है

जो शासक इसे समझे और समझये वही सत्य है
वह उदाहरण है तर्कसंगत बुद्धिमान व्यक्ति का
आदर्श साकार करने के लिए
विपुल सर्वोच्च गुण है उसके पास
गहराई एवं चौड़ाई में सोचने की क्षमता इस गुण का एक रहस्योद्घाटन
इस तरह वह दे के साथ किसी भी चीज़ में विसंगती देख पाता है
इसलिए वह जानता है कि समस्त जगत में एकता एवं सद्भाव की बहाली कैसे हो

६६

घाटियों में हावी हैं समर्थ नदियाँ
केवल इसलिए कि वे अपने जल को नीचे निर्देशित करने का यत्न करती हैं

जो कोई उच्च पद कि कामना करे
उसे नीचे से ऊपर तक समस्त लोगों से वार्तालाप करना चाहिए
और जो कोई भी आगे आना चाहे
उसे प्रदर्शनपूर्वक लोगों के पीछे खडा रहना चाहिए
कोई बुद्धिमान व्यक्ति यदि ऐसा करे
वह किसी के लिए बोझ नहीं है, ना किसी के गले में दासता का फंदा है
और आगे होने पर भी
वह मार्ग में बाधा नहीं होता
जनता अपनी इच्छा से उसे आगे करती हैं
और उनकी सम्रस्याओं के लिए उसे दोष नही देती
बुद्धिमान व्यक्ति का संघर्ष किसी से नही
ना उसका कोई योग्य प्रतिद्वंदी है

६७

कोई भी संबंध सदा-सदा के लिए नहीं होता
यदि आप इसमे कुछ नाप-तोल का यत्न करे
तो समय के साथ उस मुल्यमापन का ही मूल्य खो जायेगा
और एक माप से जुडे दृष्टिकोण को विपरीत कर देगा
जो लघु है वो गुरू होगा
समय विशालता का संकोच करेगा
नित्य है महान दाओ
क्योंकि भौतिक जगत में कुछ भी इसके समतुल्य नही

किंतु मेरे लिए विशेष मूल्यवान हैं केवल तीन मुद्दे :
प्रेम में आत्म-बलिदान, जो साहस देता है
अपव्यय न करना, जो उदारता एवं दया का आर्विभाव होता है
एवं शील जिससे अधिकारियों में जनता के लिए सम्मान उत्पन्न होता है
सामंजस्य खोने का अर्थ है विरोधों में संतुलन की हानी
दया या वीरता में अधिक महत्व किसको दिया जाए
या अपने राजपाठ से सन्तुष्ट होकर शील को भूल जाए
मृत्यु निश्चित रुप से उसकी प्रतीक्षा कर रही है
प्रेम वह है जो युद्धमे विजयी करे
अभेद्य है प्रेम जो रक्षा मे सक्षम है
स्वर्ग उसका रक्षक है जो प्रेम करता है

६८

अनुभवसंपन्न योद्धा युद्ध की लालसा नहीं करता
दुर्जेय विर नायक आत्म-संयम नहीं खोता
बुद्धिमान रणनीतिकार मैदान में युद्ध का आरंभ नहीं करेगा
यदि कोई महान नेता जनता को प्रभावित करना चाहे
तो वह अपमान से स्तंभित नही होता
यह बिना हिंसा के बिना विजय संपादन की प्रतिभा है
यह लोगों को सहज संभालने करने की कला है
भूमि और आकाश का संयोग
एवं हमारे पूर्वजों के अनुभव के साथ योग है

६९

युद्ध की कला कहती है की परिवर्तन की संभावना बनाए रखी जाए
अतिथी की प्रतीक्षा के बजाय, अतिथी बनना उत्तम है
आगे बढने के बजाय लौट जाना बेहतर है
बल स्थान बदलता रहे, ताकि किसी को परिवर्तन ना अनुमान न हो
तैयार रहो किंतु तैयारी दिखाओ मत
और अर्थहिन शून्यता में शत्रु को प्रहार करने दो
ये सभी उपाय बिना लड़े विजयी होने के हैं

किंतु स्मरण रहे कि दुर्बलोंसे से अधिक घातक कोई शत्रू नहीं
जब आपको विजय सहज लगे या निकट या संपादित लगे
स्वाभाविक है कि नियमों का विस्मरण हो
एवं अपने मूल्यों को भूल जाएं या खो दें

जब दो सेनाओं में युद्ध आरंभ होता है
तब जिसे पश्चाताप एवं अनुताप हो वह विजयी होगा

७०

मुझे लगता है कि मेरा कथन सरल है एवं मेरी आकांक्षाएं, प्रयोजन स्पष्ट हैं
किंतु दुर्भाग्य से मुझे किसी में स्वयं की समझ दिखती नहीं
क्योंकि यहाँ एक समस्या है
बाह्य अभिव्यक्ति हैं शब्द एवं कर्म चेतना की
आत्मा के आंदोलनों का आरंभ वर्णनातीत है ना पकड़ा जा सकता है
ना आकलनिय है दूसरे के द्वारा किसी अन्य माध्यम से

हम सभी के लिए विशिष्टता मुल्यवर्धन करती है
किंतु यह संबध संचार में समस्या भी लाता है
व्यर्थ ही ज्ञानी रखता है हृदय में आभूषण
लोगों के लिए तो कपड़ों में उलझना आसान है

७१

यह जान जाना कि आप नहीं जानते, बड़ी सफलता की ओर ले जाता है
यदि आप आपके ज्ञान की सीमा से परिचीत, तो आप समस्या में पड़ जाएंगे
और कष्टों के बीच ज्ञान से ही आप हानी को कम कर पाएंगे
संभावित उलझने, उनके मूल एवं कारण
बुद्धिमान व्यक्ति समझता एवं जानता है
और सभी त्रुटियां, गलतियां करने से बच जाता है

७२

यदि अनुशासन के नाम पर बलपूर्वक आज्ञापालन थोपा जाएं
साधारणत: विरुद्ध परिणाम होता है
द्वेश होगा, बलपूर्वक विरोध, दमन विरोधी प्रत्युत्तर मिलेंगे
यदि नेतृत्व का आधार केवल भय न हो
तो यह उच्च क्षितिज को छुता है
बुद्धिमान शासक नेतृत्व की शक्ति को समझकर
इसको किसीको दिखाता नही, ना नियंत्रण का प्रदर्शन करता है
वह आत्मसम्मान नहीं खोता, उसे ना भक्ति की तृष्णा है ना स्वयं के पवित्रा की
प्रदर्शन के बजाय उसे दक्षता पसंद हैं

७३

कार्य करने का साहस हो तो भय ज्ञात नही होता
ऐसा व्यक्ती स्वयं को एवं दूसरों को मृत्यु बाटता है
केवल वही जो शीलवान, शांत, नम्र हो एवं भय से अनभिज्ञ हो
वह दूसरों को बचाएगा एवं वह स्वयं को भी नही मारेगा

वे दोनों भी सद्आकांक्षाओं से प्रेरित हैं
लेकिन कोई स्वर्ग की अपेक्षा नहीं कर सकता
बुद्धिमान भविष्यवाणी का साहस नहीं करेगा
अच्छा हो या बुरा, जो परिणाम होना हो सो होगा

सबसे सशक्त नायक संघर्ष बिना भाग्य से हार जाएगा
भाग्य बिना बुलाए आकर बिना शब्दों के उत्तर देता है
बिना योजना के, अदृश्य जाल बिछाता है
कोई ना उससे बच सकता है ना त्याग सकता है

७४

मृत्यु से ना भय हो, ना दूसरों को भयभित करो
यदि जनता भयभित न हो तो सजा का कोई अर्थ नहीं
किंतु यदि जनता मृत्यु से भयभित हो
और कोई नियमों का उल्लंघन करे
सत्ता, सम्मान एवं न्याय की रक्षा के लिए
आपको उन्हे धमकाना होगा
अपराधी को पकड़ो, दंड दो, एवं समाप्त करो
क्या आप इतना कड़ा निर्णय लेंगे?

वह जो सदैव निर्णय लेता है
बिना किसी आरोप के निर्णय सुनाते हैं
वह इसे लागू और निष्पादित भी करता है
शासक के लिए कुल्हाड़ी थामना योग्य नही
मृत्यु देवता का काम अपने हातो मे लेना
अपने स्वयंही स्वयं को क्षती पहुचाने की जोखिम होगी

७५

अगर हिंसा, लुट एवं जबरन वसूली से जनता भूखे मर रही हो
तो ऐसी अडियल व्यवस्था क्रांति की ओर ले जाती है
जनता के पास यदि खोने के लिए कुछ न हो
तो उन्हे मृत्यु का भय नही होत, अपना भविष्य बदलने का यत्न करते है
किसी भी तरह, अधिकारी उनका जीवन खा चुके होते है

यदि शासक अपने जीवन को अत्यधिक महत्व देकर अपने जीवन को मूल्य बढा दे
वह वस्तुत: वह इसका मुल्य घटाता है
केवल वही जो प्रामाणिकता से स्वयं की उपेक्षा कर सकते हैं
अपने जीवन से कुछ कीमती निर्माण करना जानते है

७६

जीवीत मनुष्य दुर्बल है
लचीला एवं कोमल होकर सहज क्षतिप्रवण भी है
किंतु समय के साथ उसके दुर्बल कोमल विशेषण
शुष्क और कठोर हो जाएंगे जब उसकी देह मर जाएगी

सभी जीव का ऐसा ही होता है:
सभी लचीले एवं कोमल रूप में आरंभ कर
शुष्क अस्थी बनकर जीवन समाप्त करते है
तो कोमलता गुण है जीवन का
और शुष्कता, कठोरता एवं कड़ापन हैं मृत्यु के लक्षण

अपमान एवं लज्जा किसी भी मूर्खता की प्रविक्षा करती है
हर सशक्त कठोर पेड़ के लिए उपलब्ध हो सकती है एक आरी
गिर कर नीचे आता है जो कठोर एवं शक्तिशाली हो
इसके विपरीत: लचीलापन एवं नम्रता प्रगती करती है

७७

जब कोई योद्धा प्रत्यंचा खींचे
वह बस धनुष के ऊंचे सिरे को नीचे झुकाकर
निचला कोना ऊपर उठता है
जितना अधिक खींचे उतना ही अधिक प्रत्यंचा अपनी ओर लेता है
हलचल की जितनी अधिक संभावना एवं हाथों का लहरना हो
धनुष के दोनों सिरों से लोचदार चाप की शक्ति उतनी ही अधिक घातक बनती है
इसलिए दाओ कहता है:
प्रभावी प्रबंधन के लिए जगत को नियंत्रित करें
अतिरिक्तता कम करने के लिए यह कम करने का यत्न करते हुवे
कमी को पूरा करता है

दाओ के विरोधीयों का वर्तन एवं परंपरा
ऐसी है जैसे गरीबों से छिनने की
और पहिलेसे ही अमीर को देने की प्रथा हो
केवल वही जो दाओ को समझे
जगत से साझा कर आनंद पाता है
जबकी ज्ञानी को किसी से मदद की अपेक्षा नहीं होती
उसे अभिमान नहीं होता जो काम पूरा कर गर्व को नकारता है
वह प्रसिद्धी का अभिलाषी नही होता

७८

पानी से अधिक तन्य एवं कोमल कुछ नहीं
किंतु वह जानता है कि सबसे ठोस, सबसे कठिन, कठोर को कैसे पराजित किया जाए
इसे झटका दो तो प्रतिक्रिया नहीं देता
क्षणभर मे कोई निशान छोड़े बिना किसीभी बल का अवशोषिण करता है
ज्ञान रहे है कि दुर्बल सामर्थवान को पराजित कर सकता है
कोमलता कठोरता पर प्रबल होती है
किंतु जीवन व्यवहार नगन्य लोग इस तथ्य का उपायोजन करते है

बुद्धिमान व्यक्ति व्यर्थही चुपचाप स्वयं को दोहराता है:
वही शासक ही पूर्ण है जो भगवान की तरह व्यवहार करे
वह जो उत्तरदायी हो किसी भी लज्जा बिना उत्तरदायीत्व स्वीकारता है
राज्य के सभी दुर्भाग्य, वह अपने ऊपर लेता है
किंतु यह अविश्वासनीय है कि विरोधाभासी सत्य
असत्य माना जाता है

७९

जब आपको अपनी अस्वस्थता पर नियंत्रण पाना हो
आपकी आत्मा मे आक्रोश शेष रहता है
वहां बुराई को अवसर मिल सकता है
इसलिए जनता को दीन हिन विवश करने से कोई लाभ नहीं

दूसरों के प्रति प्रतिबद्ध होकर
दूसरों के कर्तव्यों को नापने के बजाय
वह समझौतों का महत्व समझता है जो दे के साथ हो
अन्य केवल अधिकार एवं लाभ प्राप्ती के लिए लालाइत होते है

भावहीन हैं दाओ और प्रियजनको आगे नहीं करता
भाग्य उसी का साथी है जो सजगता से कर्तव्यपालन करता है

८०.१

छोटा सा देश मेरे सपने में आएगा
अच्छे लोग पड़ोसी साथ लायेगा
जीवन से हो समाधान
जिन्हे मृत्यू से भय हो
दूर देशों से कौन क्या पायेगा

सब कुछ है तो ईर्ष्या क्यों करे
ना ही उनके औजार भी चले
चाहे तो नाव से चले जाए पार
या फिर रथ पर हो जाये सवार
मगर सफर को कोई ना तैय्यार
शांति के लिए हथियार है सही
मगर विजय की इच्छा ही नहीं
पीढियोंसे नही हुवा आविष्कार
पीढ़ियों से है ज्ञानीयों के विचार
चल रहे है बस परंपरा से आचार

सादा भोजन उनका कितना मीठा
तन ढकने को घर का कपडा मोटा
शांत जीवन उनका शांत घर आंगन
सबका आसान सादगी भरा जीवन
प्रथा परंपरा के यहां अद्भुत हैं दर्शन

पडोस के लिए उठाया कदम हमने
वहां के भौंकते कुत्ते गा गये सामने
मरते दम तक मैं वहाँ नहीं जाऊँगा
न जाऊँ तो यहाँ वापस कैसे आऊँगा
सालों साल यहाँ शांति से रह पाऊँगा

८०.२

छोटा सा देश मेरे सपने में आएगा
भले लोग और पड़ोसी साथ लायेगा
जीवन से समाधान
और मृत्यू से भय हो
दूर देशों से कौन क्या पायेगा

सब कुछ हो तो ईर्ष्या क्यों करे
ना ही उनके औजार ही चले
चाहे तो नाव से चले जाए पार
या फिर रथ पर हो जाये सवार
सफर को मगर कोई ना तैय्यार
शांति के लिए हथियार है सही
मगर जीत की ख्वाइश ही नहीं
पीढियोंसे नही हुवा आविष्कार
सदा है यहां ज्ञानीयों के विचार
चल रहे है बस परंपरा से आचार

सादा भोजन उनका कितना मीठा
तन ढकता घर का कपडा मोटा
शांत जीवन शांत घर आंगन
सबको आसान सादा जीवन
प्रथा परंपरा के अद्भुत दर्शन

उठाया कदम पडोस में हमने
भौंकते कुत्ते आ गये सामने
अंत तक मैं वहाँ नहीं जाऊँगा
न जाऊँ तो वापस ना आऊँगा
सालों साल शांति से रह पाऊँगा

८१

सत्य प्रामाणिक भाषण सुंदरता से नही होता
ना सुंदर शब्द मनोधारणा करते है

सम्मान विवाद में अभिव्यक्त नहीं होता
जो तर्क करे सो सत्य नही पाता
सत्य जानके की क्षमता का शिक्षा, ज्ञान या संपदा से संबंध नहीं
सर्वज्ञता को ज्ञान परिभाषीत करने का अधिकार नहीं

जो मूढ़ता से ज्ञान बटोरे वह बुद्धिमान नहीं
ज्ञानी जितना ज्ञानदान करे उतना ही उसकी बुद्धि में वृद्धिंगत होता है: उतनाही अधिक प्राप्त करता है

स्वर्गस्थ उच्च दाओ समान जगत को बिना हानी जीवनदान के लिए
बुद्धिमान व्यक्ति को दाओ का कहना है कि विवाद में गिरे बिना निर्माण करो

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